प्याज की महंगाई पर काबू पाने के लिए केंद्र सरकार ने 2 लाख टन प्याज के भंडार किया है। हालांकि, इससे अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं के प्रभावित होने की आशंका है। जानकारों के मुताबिक खराब मौसम समेत अन्य समस्याओं की वजह से प्याज की खेती प्रभावित हुई है। ऐसे में आने वाले दिनों में प्याज की किल्लत महसूस की जा सकती है।
सितंबर में महंगाई की मार: आमतौर पर सितंबर के दौरान प्याज की कीमतों में वृद्धि होती है। इस दौरान पुराना स्टॉक खत्म हो जाता है और नई फसल के लिए सर्दियों का इंतजार करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, 2017 की पहली छमाही में, थोक प्याज की कीमतों में गिरावट आई। इस वजह से महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में किसानों ने व्यापक विरोध प्रदर्शन किया था।
इसके बाद उस वर्ष की दूसरी छमाही में, जब सरकार ने अतिरिक्त स्टॉक खरीदने के लिए बाजारों में हस्तक्षेप किया, तो कीमतें बढ़ने लगीं। 2019 और 2020 में भी, कई शहरों में सितंबर और नवंबर के बीच खुदरा दरें 90 रुपए प्रति किलोग्राम से अधिक हो गई थीं। इससे आम लोगों का बजट प्रभावित हुआ।
लगातार बफर स्टॉक में इजाफा:
आंकड़े बताते दें कि 2017-18 में प्याज के बफर स्टॉक को 5,137 मीट्रिक टन से बढ़ाकर 2020-21 में 100,000 मीट्रिक टन कर दिया गया है। वहीं, बफर स्टॉक को 2021-22 में 200,000 मीट्रिक टन तक बढ़ाया गया है।
अधिकारी ने कहा कि सरकार सभी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों की निगरानी कर रही होती है। महंगाई को काबू में लाने के लिए जरूरी कदम उठाए जाते हैं। अगर प्याज की कीमतों में वृद्धि होती है, तो इसे स्थिर रखने के लिए बफर स्टॉक से निकाली जाती है। यही वजह है कि स्टॉक को भी बढ़ाया जाता है।









