साधुओं का आम लोगों की तरह दाह संस्कार क्यों नहीं किया जाता है?

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अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी को भू-समाधि दी गई है। माने दफना दिया है। हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार में लोगों को जला दिया जाता है। तो ऐसे में नरेंद्र गिरी को दफनाया क्यों गया है, आइए जानते हैं।

साधुओं को एक पवित्र आत्मा माना जाता है। हिंदू धर्म के मानने वाले लोग आत्मा के अस्तित्व में यकीन रखते हैं जो मृत्यु के बाद स्थानांतरित होती है। यह भी माना जाता है कि पुनर्जन्म तब ही होता है जब आत्मा किसी व्यक्ति के जीवन चक्र के दौरान सभी आसक्तियों से मुक्त हो जाती है।

मृत्यु के वक्त शरीर मर जाता है, लेकिन आत्मा तब तक आसक्तियों में बनी रह सकती है जब तक कि नश्वर अवशेष भौतिक रूप में मौजूद हो। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक शरीर का अंतिम संस्कार करने से सांसारिक लगाव पूरी तरह से खत्म हो जाता है। इससे आत्मा को सांसारिक जरूरतों से मुक्त करने का रास्ता बनता है।

एक संन्यासी सभी सांसारिक आसक्तियों और सुखों को त्याग कर ही संत बनता है। ऐसे किसी व्यक्ति की जब मृत्यु होती है तो यह माना जाता है कि संन्यासी भौतिक शरीर को छोड़ देता है और मृत्यु के बाद कपाल मोक्ष के जरिए अमरता को प्राप्त करता है। यह इस विश्वास पर आधारित है कि साधु-संतों का प्राण, एक दिव्य रास्ते के जरिए शरीर को छोड़ देता है।
साधु एवं संतों को लेकर यह मान्यता है कि वे भौतिक शरीर में ही तमाम आसक्तियों से मुक्त हो जाते हैं। ऐसे में दाह संस्कार के बिना भी उनकी आत्मा मुक्त हो जाती है।

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Author: samachardoot

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