साउथ इस्टर्न कोलफिल्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) में अब तक लगभग 50 मिलियन टन (500 लाख टन) कोयला उत्पादन हो सका है। शेष चार माह में 92 मिलियन टन (920 लाख (टन) कोयला उत्पादन करना किसी चुनौती से कम नहीं है। केवल एसईसीएल कोरबा एरिया ही अबतक निर्धारित लक्ष्य से आगे चल रहा है, जबकि अन्य सभी परियोजना पीछे है।
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एसईसीएल के 13 क्षेत्र अंतर्गत संचालित कोयला खदानों को वित्तीय वर्ष में 172 मिलियन टन (1720 लाख टन) करना है। इसके लिए कंपनी ने प्रति दिन कोयला उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया हैं, पर उसके मुताबिक कोयला उत्पादन नहीं हो रहा है। वर्तमान में प्रतिदिन कंपनी को औसतन 5.50 लाख टन कोयला उत्पादन करना है, पर अधिकतम 4.60 लाख टन कोयला ही उत्पादन हो रहा है। अभी तक एसईसीएल को 1025 लाख टन कोयला उत्पादन करना था, पर लगभग 200 लाख टन पीछे है।
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कंपनी के आला अफसरों की नजर मेगा परियोजना गेवरा (476 लाख टन), दीपका 350 लाख टन व कुसमुंडा ही (450 लाख टन) खदान पर नजर टिकी है, पर तीनों खदान में अभी तक क्रमश: 233 लाख टन, 191 लाख टन व 164 लाख टन ही कोयला उत्पादन हो सका है। इसे लेकर प्रबंधन की चिंता बढ़ गई है।
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उत्पादन प्रभावित होने की वजह इन तीनों परियोजना में बार बार आंदोलन होना है। भू- विस्थापितों व अन्य लोगों के आंदोलन की वजह से कोयला उत्पादन व लदान लगातार प्रभावित हो रहा है। प्रतिदिन पिछड़ने की वजह से कोयला क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि चालू वित्तीय वर्ष में कंपनी एक नंबर स्थान से नीचे खिसक सकती हैं।
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कोल इंडिया भी हांफ रही
कोल इंडिया को चालू वित्तीय वर्ष में 6700 लाख टन कोयला उत्पादन करना है, पर अभी तक 3590 लाख टन कोयला उत्पादन हो चुका है, यानी आंकड़ा पचास फीसद ही पार हो सका है। इसी तरहलदान में भी कंपनी लक्ष्य हासिल करने हांफ रही है। आठ माह बाद 5000 लाख टन कोयला लदान होना था, पर 4280 लाख टन ही हो सका।
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लदान बढ़ने के बाद भी पिछड़े
एसईसीएल प्रबंधन ने कोयला प्रेषण (डिस्पैच) बढ़ाया है, इसके बावजूद कंपनी पीछे है। औसतन प्रतिदिन 55 रेक से स्थान 153 रेक ही कोयला वाहर निकल रहा है। अभी तक एसईसीएल की सभी खदानों से | 1002 लाख टन कोयला लदान हो चुका है। जबकि 1270 लाख टन कोयला प्रेषण होना था। प्रबंधन की कोशिश है कि शेष चार माह में लदान बहा कर अपना लक्ष्य हासिल किया जाए।
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कुसमुंडा की स्थिति सबसे ज्यादा खराब
एसईसीएल की मेगा परियोजना कुसमुंडा • की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। बारिश व आंदोलन का असर इस खदान में सबसे ज्यादा पड़ा है। खदान को इस बार 450 लाख टन कोयला निकालना है, पर आठ माह में 160 लाख टन ही कोयला निकल सका है। यही स्थिति लदान में भी है। 320 लाख टन के एवज में 225 लाख ही लदान हुआ है। स्थिति में सुधार करने का प्रयास प्रबंधन द्वारा लगातार किया जा रहा है. पर इसमें ज्यादा सफलता मिलती नजर नहीं आ रही है। कमोवेश गेवरा व दीपका ख दान भी यह स्थिति बनी हुई है।









