राजधानी दिल्ली में एक दंपति के लिए पिछला एक दशक बहुत कष्टकारी रहा। दस साल पहले 14 साल का उनका बेटा स्कूल जाने के लिए घर से निकला और फिर वापस नहीं आया। घटना के एक साल आठ महीने बाद पुलिस ने एक नाले से एक खोपड़ी व 103 हड्डियां बरामद कीं। इन हड्डियों के डीएनए का मिलान इस दंपति से किया गया और पाया कि यह खोपड़ी व हड्डी उनके 14 साल के बेटे के हैं।
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पुलिस ने कुछ संदिग्धों को आरोपी बनाया और गिरफ्तार कर लिया।इस बीच यह दंपति अपने नाबालिग बेटे को इंसाफ मिलने का इंतजार करते रहे। परन्तु अदालत में आरोपियों के खिलाफ आरोप साबित नहीं हो सके और उन्हें बरी कर दिया गया।
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रोहिणी स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शिवाजी आनंद की अदालत ने इस मामले में दो नाबालिगों एवं दो अन्य लोगों को बरी करते हुए कहा है कि पुलिस किसी भी तरह से आरोपियों का संबंध नाबालिग के अपहरण व हत्या से नहीं जोड़ पाई है।
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अदालत ने यह भी कहा कि बच्चे के शव के अवशेष इतनी देरी से मिले कि उसकी डीएनए से पहचान होने के अलावा कोई अन्य पुख्ता सबूत बचे ही नहीं थे। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि घटना बेहद दुखद है। माता-पिता के लिए यह हादसा कभी ना भरने वाला जख्म है। परन्तु आरोपियों पर आरोप साबित करना पुलिस का काम है। जिसे वह कर नहीं पाई है।
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इस मामले में विडंबना यह रही कि 14 साल के बच्चे की खोपड़ी व 103 हड्डी तो पौने दो साल बाद एक नाले से बरामद हो गए। लेकिन पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर भीम सिंह ने अपनी रिपोर्ट में कहा गया कि इन हड्डियों से यह पता लगाना मुश्किल है कि बच्चे की मौत की वजह क्या रही।
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उन्होंने अपने बयानों में यह भी कहा कि यह कहना मुश्किल है कि बच्चे की हत्या की गई तो किस तरह गई, क्योंकि सिर्फ हड्डियों से यह पता लगाना नामुमकिन है।









