कहा जाता है कि अपराध कभी छिपता नहीं और अपराधी कभी बचता नहीं। एक युवक पिछले 28 सालों से कानून की आंखों में धूल झोंक कर छिपा हुआ था। लेकिन आखिरकार वो कानून के लंबे हाथों से बच नहीं सका। हम बात कर रहे हैं बाला जोशी की। बाला जोशी उर्फ बलराम पर आरोप है कि शराब पीकर उसने अपने दोस्त की हत्या कर दी थी। इस हत्याकांड के बाद से बलराम जंगल में जाकर छिप गया। पुलिस से बचने के लिए वो सड़क किनारे छोटे-छोटे ढाबों में काम करने लगा। वो सुदूर गांवों में ठहरता था और किसी एक स्थान पर ज्यादा समय तक नहीं रहता था।
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इतना ही नहीं पुलिस से बचने के लिए बलराम अपने बीवी, बच्चों से भी नहीं मिला। वो अपने कई नाम बदलता था और उसने कभी नौकरी नहीं की क्योंकि वहां उसे आईडी कार्ड दिखाना पड़ता। बरसों बीत गए लेकिन छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के सोरार गांव के पुलिसवाले उसे कभी नहीं भूले। उसकी फाइल हमेशा खुली रही। कई सारे अफसर आए और करीब इन तीन दशकों में वो रिटायर भी हो गए। लेकिन बाला को पकड़ने की कोशिश कभी बंद नहीं की गई।
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आखिरकार बीते मंगलवार को बाला को भिलाई के बाहरी इलाके में स्थित एक गांव नेवई से गिरफ्तार कर लिया गया। यह जगह उसके गांव से करीब 60 किलोमीटर दूर है। पुलिस की हिरासत में बाला ने उस हत्याकांड का राज भी खोला।
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उसने बताया कि वो चंद्रिका यादव और कुछ अन्य दोस्तों के साथ जुलाई 1994 में सोरार गांव में कार्ड खेल रहा था। यह जगह रायपुर से करीब 90 किलोमीटर दूर है। पुलिस ने बताया कि बाला ने माना है कि उसने उस वक्त शराब पी रखी थी। उसे यह महसूस हुआ कि चंद्रिका यादव खेल में चीटिंग कर रहा है। जब उसने चंद्रिका से यह बात कही तो चंद्रिका चीटिंग की बात मानने से लगातार इनकार करने लगा।
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इसके बाद उसने एक तौलिये से चंद्रिका यादव का दम घोंट दिया और वहां से फरार हो गया। जब तक वहां पुलिस पहुंची वो बहुत दूर निकल चुका था। फरारी के दौरान बाला ने मजदूर के तौर पर काम किया। फिर वो दंतेवाड़ा में नक्सलियों से भी बच गया। उसने बैलाडिला की पहाड़ियों पर भी कुछ दिन गुजारे। उसने ढाबा में काम किया।
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बाला की पत्नी और बच्चे सोलार गांव में रहते थे। लेकिन वो उनसे मिलने कभी नहीं गया। हालांकि, इस उम्मीद में कि बाला कभी वहां आएगा पुलिस लगातार उसके घर पर नजर रख रही थी। कई बार पुलिस को उसकी मौजूदगी की सूचना भी यहां-वहां से मिली लेकिन वो पुलिस के पहुंचने से पहले गायब हो जाता था।
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बेघर रहने के अलावा बाला ने गलियों में भीख भी मांगा और दैनिक मजदूर के तौर पर काम किया। इधर कानूनी कार्रवाइयों के दौरान साल 2005 में अदालत ने उसके खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी किया था। पुलिस उसकी सरगर्मी से तलाश कर रही थी।
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इस बार पुलिस के एक मुखबिर ने सूचना दी कि बाला राजनंदगांव नाम के एक गांव से निकल कर नेवाई गांव में पहुंचा है। इस बार पुलिस ने बाला को मौका नहीं दिया और उसे पकड़ लिया गया।









