Kargil Vijay Diwas: कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी घुसपैठिये सैनिकों को परास्त कर खदेड़ने में इंदौर ने भी दिया था योगदान

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Kargil Vijay Diwas: इंदौर, दो महीने तक चलने वाले कारगिल युद्ध में देश के 527 वीर सैनिकों ने अपना बलिदान दिया था। इस युद्ध में दुश्मनों को भारतीय सीमा से खदेड़कर भगा देने वालों में इंदौर के वीर भी शामिल थे। युद्ध में हिस्सा लेने वाले वीरों में से कुछ तो वापस अपने घर लौट कर आ गए, किंतु कुछ देश की रक्षा में बलिदान हो गए। इंदौर आज भी उन वीरों की गाथाओं को पूरे गौरव के साथ गाता और सुनता है। इनके सम्मान में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और बच्चों को इनकी वीरता की कहानियां सुनाई जाती हैं। कारगिल विजय दिवस (आज) के अवसर पर नईदुनिया सिटी ने उन बहादुरों को याद किया और उनके स्वजनों से सुनी उनकी वीरता की कहानी। सकुशल की चिट्ठी से पहले मिली वीरगति की सूचना इंदौर के गोयल नगर में रहने वालीं शोभा लिंगवाल के पति लांस नायक दिलीप सिंह लिंगवाल इस युद्ध में बलिदान हो गए थे। वे थ्री ग्रेनेडियर यूनिट में कश्मीर के अखनूर सेक्टर में पदस्थ थे। शोभा अपने जीवनसाथी को याद करते हुए अश्रुपूरित होकर बताती हैं, वे जब युद्ध पर जा रहे थे, तब हमारे दो बेटे थे। छोटे बेटे की उम्र तो तब एक वर्ष ही थी। मुझे नहीं पता था कि यह हमारी आखिरी मुलाकात है। युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों को पीछे हटाने के लिए पाकिस्तान ने बांध का पानी छोड़ दिया था। पानी के बहाव में मेरे पति व अन्य भारतीय सैनिक बह गए। मुझे अपने पति का शव तक नहीं मिला। मैं उन्हें कभी दोबारा नहीं देख नहीं पाई। इस युद्ध में शामिल होने के लिए वह 9 जुलाई को 1999 को गए थे। उन्होंने वहां पहुंचकर मुझे सकुशल पहुंचने की चिट्ठी लिखी थी, लेकिन चिट्ठी पहुंचने से पहले ही उनके वीरगति को प्राप्त होने की दुखद सूचना आ गई थी। 4 जुलाई की लड़ाई, जिसने बदल दिया युद्ध का परिणाम महू निवासी कर्नल दिनेश कुमार ने कारगिल युद्ध में टाइगर हिल पर भारत को मिली सफलता के बारे में बताया। कर्नल दिनेश कारगिल युद्ध में दूसरे सेक्टर पर तैनात थे। उन्होंने युद्ध के महत्वपूर्ण घटनाक्रम के बारे में बताते हुए कहा कि कारगिल के युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई जो थी, वह 4 जुलाई की थी। इस दिन भारत के 18 ग्रेनेडियर की पलटन ने टाइगर हिल के ऊपर अपना तिरंगा ध्वज फहराया था। इस हिल पर कब्जा करने के बाद श्रीनगर से लेह जाने वाला मार्ग खुल गया था। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने तब कहा था कि टाइगर हिल मदर आफ आल बैटल्स (सभी झगड़ों/युद्धों की मां) है। इसे भारत के हाथों में नहीं आने देंगे। लेकिन जब भारत के सैनिकों ने इस पर फिर से अपना कब्जा करते हुए तिरंगा झंडा फहरा दिया, तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने अमेरिका के राष्ट्रपति से युद्ध को रुकवाने के लिए मदद मांगी थी। तब भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि जब तक पाकिस्तान का एक भी सैनिक भारत की सीमा के भीतर रहेगा, तब तक यह युद्ध खत्म नहीं होगा। टाइगर हिल पर सफलता प्राप्त करने वाले 18 ग्रेनेडियर को 52 वीरता पुरस्कार प्रदान किए गए थे। इनमें एक परमवीर चक्र और दो महावीर चक्र शामिल थे। दुश्मनों को खदेड़ते वक्त हाथ पर लगी थी गोली मूसाखेड़ी क्षेत्र की शिक्षक कालोनी में रहने वाले कैप्टन सुरेंद्र सिंह कारगिल युद्ध में 11 राजपूताना राइफल में हवलदार के पद पर थे। उन्होंने दुश्मनों से लड़ाई लड़ी थी। युद्ध के दौरान उनके बाएं हाथ में गोली भी लगी थी। वे बताते हैं कि युद्ध खत्म होने के बाद भी कारगिल सेक्टर के कई हिस्सों में पाकिस्तान के सैनिक घुसे हुए थे। पाकिस्तान तुर्तुक सेक्टर पर कब्जा करना चाहता था, ताकि वो वहां से भारतीय सेना की गतिविधियों पर नजर रख सके। किंतु हमारी सेना ने एक-एक घुसपैठिये को खोजकर बाहर निकाला था। उस वक्त करीब 24 घंटे तक दोनों ओर से फायरिंग चलती रही। हमने नौ पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया था और रात करीब 1.30 बजे उस पोस्ट पर तिरंगा फहराकर कब्जा कर लिया था। कारगिल युद्ध में सेना तक पहुंचाए थे वाहन कारगिल की लड़ाई में अहम भूमिका निभाने वाले बीएसएफ के सेवानिवृत्त सूबेदार वृंदावन सुल्लेरे छोटा बांगड़दा के श्रीलक्ष्मी नगर में रहते हैं। युद्ध शुरू होने से पहले वे श्रीगंगानगर (राजस्थान) में पदस्थ थे। कारगिल युद्ध में जब सेना को वाहनों की जरूरत पड़ी, तो बीएसएफ ने जबलपुर की व्हीकल फैक्ट्री से 17 वाहन तैयार कराकर कारगिल भेजे थे। इन वाहनों को सड़क मार्ग से ले जाने की जिम्मेदारी एक दल को दी गई थी। इस दल के दूसरे प्रमुख अधिकारी सूबेदार वृंदावन सुल्लेरे थे।
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Author: samachardoot

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