रीतिरिवाज से बकरे हुआ कफन दफन, दशकर्म के लिए रिश्तेदारों को दिया गया न्योता और हुआ मृत्युभोज का आयोजन, बकरे के स्मृति में बनाया तुलसी का चैरा

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रायगढ़। रायगढ़ पूर्वी अंचल के छत्तीसगढ़ सरहद से लगे ओड़िसा के गांव कुमर जिला झारसुगुड़ा में आज एक अनोखा किंतु मर्मस्पर्शी खबर छनकर आ रही है। मूक जानवरों के प्रति अगाध प्रेम व आस्था के पर्याय सूरत प्रधान ने अपने घर पर एक बकरा पाल रखा था जो 17 वर्ष तक जीवित रहा किन्तु वृद्धावस्था के कारण गत 18 नवम्बर को निधन हो गया।

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अपने घर मे एक परिवार की सदस्य के रूप में इस बकरे का स्थान था । जय गुरुदेव के अनुयायी होने के कारण सूरत प्रधान का परिवार मांस मदिरा से कोषों दूर रहा है। जिस बकरे को लोग मारकर भोजन करते हैं उसी बकरे के प्रति अगाध आस्था व प्रेम सूरत प्रधान में इतना घुलमिल गया कि बकरे के निधन के बाद उसे रीति रिवाज के साथ ग्रामीणों के सहयोग से कफन दफन किया गया और उसके चिर स्मृति के लिए तालाब के मेड़ पर तुलसी चैरा बना कर पूजा अर्चना प्रतिष्ठा भी की गई।

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बाकायदा शोकपत्र छपवाकर अपने सगे संबंधियों को आमंत्रित कर दशकर्म संपादित किया गया तथा लगभग 1500 से अधिक लोगो को मृत्यु भोज दी गयी। सूरत प्रधान का कहना है कि पहले वह ड्राइवर था ,और चंद्रपुर स्थित मां चंद्रहासिनी मंदिर जाया करता था जहाँ पर उसने एक बकरा बलि देने की इच्छा व्यक्त की थी और इसी लिए इस बकरे को डूमरपाली गांव से खरीदकर लिया था किंतु मातारानी ने सपने में उसे बकरा बलि देने मना कर दी। तब से इसे घर पर ही रखकर पाला पोसा और मन मे यह धारणा बना लिया कि जब भी इसकी मृत्यु होगी घर के सदस्य की भाँति इसका अंतिम संस्कार करेंगे।

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Author: samachardoot

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