ऐसे रुकेगी मनरेगा में चोरी, सरकार में इच्छा शक्ति की कमी, जटिलताओं का फायदा उठाते हैं भ्रष्टचारी

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झारखंड में मनरेगा की राशि के बंदरबाट में मनरेगा कर्मी, पंचायत प्रतिनिधि व प्रशासनिक पदाधिकारी का हिस्सा बंधा रहता है। आला अधिकारियों व स्थानीय जन प्रतिनिधियों की संलिप्तता इससे समझी जा सकती है कि शिकायतों के मिलने व सामाजिक अंकेक्षण में चोरी पकड़े जाने के बावज़ूद दोषियों पर न के बराबर कार्रवाई होती है। इन सबका नतीजा होता है कि अक्सर योजना अपूर्ण रह जाती है।

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मजदूरों का भुगतान बकाया रह जाता है या योजना के मालिक को कर्ज लेकर भुगतान करना पड़ता है। मनरेगा का सोशल ऑडिट करनेवालों में सिराज दत्ता ने इससे जुड़ी कई गड़बड़ियों का जिक्र अपनी रिपोर्ट में की है।

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मनरेगा कानून में ही अधिकारों के उल्लंघन व चोरी रोकने के लिए सामाजिक अंकेक्षण समेत कई प्रावधान हैं। उदहारण के लिए अगर समय पर मजदूरी भुगतान न मिले तो दोषी पदाधिकारी से वसूली कर मजदूर को मुआवजा मिलना है। छोटे-से-छोटे उल्लंघन के लिए भी आर्थिक दंड लगाने का प्रावधान है।

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सरकारी राशि के गबन के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई हो सकती है। लेकिन प्रशासन में चोरी न रोकने की मंशा इससे समझी जा सकती है कि इन प्रावधानों का इस्तेमाल न के बराबर है। सत्तारूढ़ दलों ने अपने चुनावी अभियान में कई बार मजदूरों के अधिकारों के उल्लंघन एवं मनरेगा की समस्याओं को उठाया था।

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सरकार में मनरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करने की कोई दृढ़ इच्छाशक्ति अभी तक दिखाई नहीं दे रही है। भ्रष्टाचार रोकने के बजाय उसे बढ़ावा देने के कई उदाहरण देखने को मिले हैं। जैसे, पिछले साल कई महीनों तक सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया को ही रोक दिया गया था।

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चोरी के तंत्र को तोड़ने के साथ-साथ भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए मनरेगा कार्यक्रम में भी कई बदलाव की जरूरत है। मनरेगा का कार्यान्वयन दिन-पर-दिन तकनीकी जटिलताओं में उलझ गया है, जो मजदूरों के लिए समझना मुश्किल है। समय पर भुगतान में अनिश्चितता बरकरार है। इस स्थिति का लाभ भ्रष्टाचारियों को मिलता है।

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सरकार व प्रशासन को जवाबदेह बनाने की जिम्मेवारी राज्य की जनता को भी लेनी पड़ेगी। मनरेगा योजनाओं की अधिकांश जानकारी ऑनलाइन एमआईएस में सार्वजानिक है। अगर लोग अपने क्षेत्र की योजनाओं के दस्तावेजों (मस्टर रोल आदि) को एमआईएस से निकालकर ग्राम सभाओं व जन सभाओं में सार्वजानिक व सत्यापित करें तो चोर की करतूत सबके सामने दिखेगी, तब शायद सरकारी तंत्र की नींद भी खुलेगी।

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सोशल ऑडिट टीम के सदस्य सिराज दत्ता के मुताबिक झारखंड के लिए मनरेगा का महत्व किसी से छुपा नहीं है। चाहे गांव में ही रोजगार उपलब्ध करवा के पलायन रोकना हो या कुआं, तालाब व आम बगान जैसी योजनाओं से आजीविका सुदृढ़ करना या दुर्गम क्षेत्र में कच्ची सड़क बनाना, मनरेगा से ग्रामीण विकास की अपार संभावनाओं के कई जीते-जागते उदहारण हैं। मनरेगा को भ्रष्टाचारियों के चंगुल से निकालना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

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Author: samachardoot

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