अपने सौंदर्य और सादगी के लिए पहचाने जाने वाले छत्तीसगढ़ में प्रेम भी पूरे वेग के साथ प्रवाहित होता है। कालीदास के अमर प्रेम ग्रंथ मेघदूतम की रचना स्थली भी यही है। यहां प्राचीन गुफाओं की दीवारों पर, बीहड़ वनों के बीच बने भोरमदेव जैसे मंदिरों की दीवारों पर सदियों पहले के प्रेम संदेश दर्ज हैं। 18 वीं सदी में ब्रिटिश सेना के साथ भारत आए सर अलेक्जेंडर कनिंघम बड़े पुरातत्वविद थे। उन्होंने सरगुजा, रामगढ़ की सीताबेंगरा गुफा में लिखे एक वाक्य का अनुवाद किया था। उसमें लिखा है “यहां रूप दक्ष देवदीन ने देवदासी सुतनुका की कामना की…”। यह दूसरी-तीसरी सदी में लिखा प्रेम संदेश है।
देवदीन और सुतनुका की प्रेम कहानी प्राचीन ग्रंथों में है और यह भी है कि वो मिल नहीं पाए, क्योंकि देवदीन को आजीवन कारावास में डाल दिया गया। आशय यह कि इस प्रदेश में प्रेम कहानियों का इतिहास सदियों पुराना है। यहां की प्रकृति में प्रेम इस तरह घुला हुआ है कि नदियों की उत्पत्तियों के पीछे भी प्रेम कहानियां हैं। प्रदेश की बड़ी-छोटी ऐसी कुछ नदियां हैं जिनके जन्म के पीछे प्यार, विरह, वेदना की कहानियां हैं। हम आज आपको छत्तीसगढ़ की नदियों की प्रेम कहानियों के बारे में बताएंगे…
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देश की पवित्र नदियों में से एक नर्मदा का उद्गम छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे अमरकंटक में है। इसका बहाव छत्तीसगढ़ की ओर आते-आते एकदम मुड़ जाता है। प्राचीन समय से चली आ रही कहानी और जनश्रुति के मुताबिक यह नर्मदा का नाराज होकर मुंह फेर लेना है। नाराजगी वाली बात वास्तविकता से करीब इसलिए भी लगती है क्योंकि नर्मदा देश की ऐसी बिरली नदी है, जिसका बहाव पश्चिम की ओर है। अमूमन नदियों का बहाव पूर्व दिशा की ओर है। नर्मदा की इस नाराजगी के पीछे है उनको प्यार में मिला धोखा और छल। वह भी उसकी अपनी ही दासी जोहिला और होने वाले पति सोन से।
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जोहिला उसकी सहायक नदी है और सोन, छत्तीसगढ़ के पेंड्रा के पास से ही निकलने वाला नद ( तीन नद माने गए हैं, ब्रह्मपुत्र, सोन और सिंधु)। प्रचलित कहानी के मुताबिक नर्मदा का विवाह सोन ( इसे नर्मदा पुराण में शोणभद्र भी कहा गया है) से होने वाला था, लेकिन उसके साथ छल हुआ और वह उल्टी दिशा में बहने लगी।
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नर्मदा पुराण के मुताबिक रेवा (नर्मदा), राजा मैकल की पुत्री थीं। मैकल ने घोषणा की थी कि जो भी बकावली के दुर्लभ फूल लाएगा वो उसका विवाह रेवा से कर देंगे। राजकुमार शोणभद्र ( सोन) के रूप पर वह पहले ही मुग्ध थी। उसने उसे फूल लाने कहा। राजा मैकल ने रेवा के विवाह का मंडप भी बनवा दिया। यह आज भी मड़वा महल के नाम पर यहां दिखाई देता है। राजकुमार शोणभद्र फूल भी लेकर आ गया, लेकिन मैकल तक नहीं पहुंचा। इससे रेवा को चिंता हुई और उसने अपनी दासी और सहेली जोहिला को सोन के पास भेजा।
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जोहिला के रूप पर सोन मुग्ध हो गया। जोहिला भी राजकुमार की ओर आकर्षित हो गई। जब काफी देर हो गई तो रेवा राजकुमार के महल पहुंची वहां उसने जोहिला और सोन का प्रेमालाप देखा और बेहद नाराज होकर चिरकुंवारी रहने का व्रत ले लिया। ऐसी भी मान्यता है कि इस घटना के बाद नर का मर्दन मतलब अपमान करने के कारण रेवा का नाम नर्मदा पड़ा। इसके बाद वह उल्टी दिशा में चल पड़ी। उसके गुस्से के कारण सोन वहां से लुप्त हो गया। आज भी सोन अपने उद्गम के बाद सीधे सोनमुड़ा में दिखता है और फिर नर्मदा की दिशा से ठीक उल्टा पूरब की ओर बहने लगता है। जोहिला कुछ दूरी के बाद सोन में मिल जाती है।
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छत्तीसगढ़ की बड़ी नदियों में से एक है शिवनाथ। इसका उद्गम महाराष्ट्र बार्डर के गढ़चिरौली जिले से है, लेकिन इसका बहाव सिर्फ छत्तीसगढ़ में है। इसे लेकर दो लोक कथाएं हैं। दोनों का कथानक एक है, लेकिन युवती का नाम अलग-अलग है। कथा के मुताबिक छत्तीसगढ़ का एक आदिवासी युवक महादेव का अनन्य भक्त था। उसे सभी शिव ही बुलाते थे। इसी शिव से गांव के बड़े किसान की बेटी पारू प्यार करती थी। उस समय विवाह के लिए कन्या के परिवार को भरपूर राशन, कपड़े, उपहार देना होता था, लेकिन शिव बेहद गरीब था। उसके लिए ऐसा संभव नहीं था। शिव को पारू का पिता भी पसंद करता था, इसलिए उसने उस समय के प्रचलित लमसेना रिवाज के अनुरूप शिव को अपने घर सेवा करने रख लिया।
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इस प्रथा के अनुसार यदि ससुराल वाले युवक की सेवा-कामकाज से खुश हो जाते तो उसे घरजमाई बनाकर रख सकते थे। शिव पूरे मन लगाकार काम कर रहा था, लेकिन पारू के भाइयों को एक गरीब आदिवासी से अपनी बहन की शादी स्वीकार नहीं थी। उन्होंने एक रात खेत की मेड़ टूटने का बहाना बनाया और शिव से कहा कि वह जाकर मेड़ बना दे। जैसे शिव खेत पर पहुंचा। पारू के भाइयों ने उसकी हत्या कर दी और शव दफना दिया। सुबह तक जब शिव नहीं लौटा तो पारू उसे ढूंढते हुए खेत पहुंची। वहां जमीन से शिव की एक उंगली निकली हुई थी। यह देखकर पारू ने पागलों की तरह मिट्टी हटाई। अंदर शिव की लाश थी और उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। यह देखकर पारू भी उस पर गिर पड़ी और रोते-रोते अपने प्राण त्याग दिए। वहीं, उसी गड्ढे से शिवनाथ का उद्गम हुआ। एक अन्य लोककथा में युवती का नाम फूलवाशन बताया गया है, लेकिन कहानी यही है।
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कोरबा जिले के कटघोरा से निकलने वाली नदी लीलागर जांजगीर-चांपा और बिलासपुर जिले को विभाजित करती है। आगे चलकर यह शिवनाथ नदी में मिल जाती है। इस नदी को लेकर जो लोक कथा है, वह शिवनाथ से मिलती-जुलती है। इसके मुताबिक कटघोरा क्षेत्र में एक गांव है बांधाखार। 200 साल पहले यहां एक जमींदार रहता था। मौहार सिंह, उसके 7 बेटे और 1 बेटी थी लीलावती। एक दिन गांव में एक हट्ट-कट्टा जवान आगर सिंह आया। वह काम की तलाश में निकला था। वह जमींदार के पास भी पहुंचा। मौहार सिंह ने उसे काम पर रख लिया। आगर सिंह की लगन, मेहनत और उसका रूप देखकर लीलावती को उससे प्यार हो गया। उसने अपने पिता से आगर सिंह से शादी करने की इच्छा जताई। मौहार सिंह बेटी की खुशी के लिए राजी हो गया, लेकिन उसके बेटे नहीं माने।
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बेटों ने आगर सिंह की हत्या की योजना बनाई। गांव के बाहर तालाब पर एक कच्चा बांध था। एक बारिश की रात लीलावती के भाई ने कहा कि बांध फूट गया है, आगर देख आओ। आगर सिंह बांध के पास गया वहां पहले से दूसरे भाई छिपे हुए थे। उसे वहीं गड्ढे में फेंक दिया। दूसरे दिन जब देर तक आगर नहीं लौटा तो लीलावती, अपने पिता के साथ बांध की ओर आई। वहां आगर की लाश देखकर वह उस पर गिर पड़ी। उसने जलदेवता का आवाहन किया और कहा कि यदि उसका प्रेम सच्चा है तो उसे आगर के साथ प्रवाहित कर दे। इसके बाद उस गड्ढे से बड़ी धार निकली और दोनों सबके सामने बहते हुए दूर चले गए। तब से लीलावती और आगर सिंह के इस अटूट प्रेम से बनी नदी का नाम लीलागर पड़ गया।
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पुरातत्व विभाग के रिटायर्ड ज्वाइंट डायरेक्टर और छत्तीसगढ़ के इतिहास, संस्कृति पर गहरी पकड़ रखने वाले राहुल सिंह कहते हैं कि जिस तरह भारत में नदियों का मानवीयकरण है, वैसे ही यहां भी है। नदियों से जुड़ी दंतकथाएं हैं, लेकिन उनमें ऐसे तथ्य हैं जो इन कथाओं को वास्तविकता के नजदीक बताते हैं। दमेरा पहाड़ी, जशपुर से निकली सिरी और बांकी जलधाराएं क्रमशः भाई-बहन मानी जाती हैं। सरगुजा के सूरजपुर-प्रतापपुर की दो जलधाराओं, बांक और बांकी नाम में दंतकथा की पूरी संभावना है। कांकेर वाली दूध नदी, महानदी की पुत्री मानी जाती है। कोल्हान नाला को राजा कहा जाता है। कोरिया की मेन्ड्रा पहाड़ी के उत्तर से निकली गोपद को नारी और दक्षिण से निकले हसदेव को पुरुष माना जाता है।
छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश की सीमा पर प्रेमी-प्रेमिका मानी गई हांफ-हंफनिन, ग्राम बांकी के दंतखेड़ा पहाड़ी से निकलती है, हांफ नर्मदा से मिल कर अरब सागर चली जाती है, लेकिन हंफनिन शिवनाथ से महानदी होते बंगाल की खाड़ी में जाती है। कान्हा-मुक्की की नर्मदा की सहायक जलधारा ‘बंजर‘, पुल्लिंग तो भीमलाट संगम की दूसरी नदी ‘जमुनिया‘ स्त्रीलिंग मानी जाती है। इसी तरह मवई, मंडला की जलधाराओं और गांव का नाम ही ‘भाई-बहन नाला‘ है।









