रायगढ़ :- विधायक ओपी चौधरी ने आज ‘स्वातंत्र्यवीर’ विनायक दामोदर सावरकर जी की जयंती के अवसर पर मुख्यमंत्री निवास में उनके तैलचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। ओपी चौधरी ने कहा जयोस्तुते हे उषे, प्रभात-किरण-भूषिते, स्वतंत्रते भगवती, त्वामहं यशोयुतां वन्दे! — यह मात्र गीत नहीं, सावरकर जी की आत्मा की पुकार थी. उन्होंने स्वतंत्रता को देवत्व का दर्जा दिया । वीर सावरकर जी को क्रांतिकारी, विचारक और समाज सुधारक बताते हुए ओपी चौधरी ने कहा वे अदम्य क्रांतिकारी थे। जिस आयु में युवा अपना भविष्य संवारते हैं, उस आयु में सावरकर जी ने ‘अभिनव भारत’ के माध्यम से अंग्रेजी साम्राज्य को चुनौती दी. काला पानी की अमानवीय यातनाएं भी उनकी राष्ट्रभक्ति को डिगा नहीं सकीं। 11 साल सेल्युलर जेल में कोल्हू चलाते हुए भी वे ‘मेरा आजीवन कारावास’ लिख रहे थे। वीर सावरकर की दूरदर्शी विचारक निरूपित करते हुए श्री चौधरी ने कहा 1857 को ‘गदर’ नहीं, ‘प्रथम स्वातंत्र्य समर’ कहा था। ‘हिंदुत्व’ की परिभाषा गढ़ते हुए भारत की सांस्कृतिक एकता का सूत्र दिया। वीर सावरकर का स्पष्ट मत रहा कि राष्ट्र की रक्षा के लिए राष्ट्र भक्ति अनिवार्य है। आज भारत में राष्ट्र भक्ति का चिंतन उनके विचारों का ही प्रतिफल है। वीर सावरकर को समरस समाज का निर्माता बताते हुए चौधरी ने कहा सावरकर जी ने रत्नागिरी में अस्पृश्यता के विरुद्ध आंदोलन चलाया सहभोज आयोजित किए, पतित पावन मंदिर बनवाया. वे जातिवाद नहीं, राष्ट्रवाद के पक्षधर थे। सावरकर जी को समझने के लिए ‘मोपला’, ‘सागरा प्राण तळमळला’ और ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ का अध्ययन आवश्यक है।इसके अध्ययन से स्पष्ट होगा कि मातृभूमि के लिए तिल-तिल कर जलना क्या होता है। आज जब भारत ‘अमृतकाल’ में ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, तब सावरकर जी का ‘आत्मबल, शस्त्रबल और विज्ञानबल’ का मंत्र हमारा पथ-प्रदर्शक है.









