देवी-देवता नहीं, यहां है कुत्ते का मंदिर, कहानी जानकर रह जाएंगे दंग, दूर-दूर से लोग आते हैं पूजा करने………………पढ़िये पूरी कहानी

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देवी-देवताओं का मंदिर आपने देखा है… पूजा-अर्चना करते लोगों को भी आपने देखा होगा। मंदिरों से जुड़ी कई कहानियां भी आपने सुनी ही होगी, लेकिन कुत्ते के मंदिर के बारे में शायद ही सुना हो… तो चलिए आपको छत्तीसगढ़ के एक ऐसे ही मंदिर के बारे में बताते हैं, जहां भगवान नहीं बल्कि कुत्ते की पूजा होती है।

यह मंदिर छत्तीसगढ़ में दुर्ग में स्थापित है। कुत्ते के इस मंदिर पर लोगों की गहरी आस्था है और अब तक यहां लाखों लोग पहुंच चुके हैं।

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दुर्ग के धमधा स्थित भानपुर गांव में कुत्ते का मंदिर है। लोग इसे कुकुरचब्बा मंदिर के नाम से जानते हैं। खेतों के बीच स्थित इस मंदिर के गर्भगृह में कुत्ते की प्रतिमा स्थापित है। एक वफादार कुत्ते की याद में इस मंदिर को बनाया गया था। इस मंदिर की देखरेख कर रहे टीकाराम साहू ने मंदिर निर्माण की कहानी बताई।

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उन्होंने बताया कि 16-17 वीं शताब्दी के समय कुकुरचब्बा मंदिर का चबूतरा बना है। इस मंदिर में छत्तीसगढ़ के अलावा मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र उत्तर प्रदेश, ओडिशा तक के श्रद्धालु आते हैं। मंदिर में कुत्ते के काटने पर प्राकृतिक इलाज है।

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यहां के ग्रामीणों और यहां पहुंचने वाले लोगों का दावा है कि कुत्ता स्थापित चबूतरे के पास की मिट्टी खाने से पागल या सामान्य कुत्ते के काटने से फैलने वाली रेबीज जैसे बीमारी पूरी तरह खत्म हो जाती है।

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टीकाराम साहू ने बताया कि सदियों पहले एक व्यक्ति अपने परिवार के साथ इस गांव में आया था। उसके साथ एक कुत्ता भी था। गांव में अकाल पड़ गया तो उस व्यक्ति ने धमधा के एक साहूकार से कर्ज लिया, लेकिन वो कर्ज वापस नहीं कर पाया।

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ऐसे में उस व्यक्ति ने अपना वफादार कुत्ता साहूकार के पास गिरवी रख दिया। उसी दौरान एक दिन साहूकार के घर में चोरी हो गई। चोरों ने सारा माल पास के ही तालाब में फेंक दिया और सोचा की बाद में उसे निकाल लेंगे, लेकिन कुत्ते को उस चोरी किए माल जानकारी हो गई।

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साहूकार के पास गिरवी में रखा कुत्ता रोज तालाब के पास जाकर बैठ जाया करता था। साहूकार को हर दिन कुत्ते के तालाब जाने और वहां जाकर दिनभर बैठने की जानकारी मिली तो उन्होंने तालाब में जाल डलवाया, जहां से साहूकार का चोरी का सारा सामान मिल गया। साहूकार ने कुत्ते की वफादारी से खुश होकर उसे गिरवी से आजाद करने का फैसला कर लिया। साहूकार ने कर्ज लिए व्यक्ति के नाम एक चिट्ठी लिखी और कुत्ते के गले में लटकाकार उसे उसके मालिक के पास भेज दिया।

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कुत्ता जैसे ही मालिक के पास पहुंचा, उसे लगा कि वह साहूकार के घर से भागकर आ गया है। उसने गुस्से में आकर कुत्ते का सिर काट दिया। कुत्ते को मारने के बाद व्यक्ति ने उसके गले में लटकी साहूकार की चिट्ठी पढ़ी तो वह हैरान हो गया। उसे अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ। उसने अपने वफादार कुत्ते को खेत में दफना दिया और चबुतरा बनवा दिया। इस चबुतरा (स्मारक) को लोगों ने मंदिर का रूप दे दिया, जिसे आज लोग कुकुरचबा मंदिर के नाम से जानते हैं।

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टीकाराम साहू बताते हैं कि किसी को कुत्ता काट ले तो उसे स्मारक की पूजा-पाठ कर चबूतरे की परिक्रमा करनी होती है। चबूतरे की थोड़ी से मिट्टी खाने से कुत्ते के काटने से होने वाली बीमारी खत्म हो जाती है। धमधा के लोग बताते हैं कि अब तक लाखों लोग इस मंदिर में आ चुके हैं और उन्हें कुत्ता काटने से संबंधित कोई समस्या नहीं है। ईश्वर साहू ने बताया कि कुकुरचब्बा मंदिर में पूजा करने दूर-दूर से लोग आते हैं। मंदिर में विधि-विधान से कुत्ते की मूर्ति की पूजा की जाती है, जिसके बाद कुत्ता काटने से संबंधित सारी समस्या खत्म हो जाती है। ऐसा ही एक मंदिर बालोद जिले में भी है।

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Author: samachardoot

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